“समाजरत्न” आचार्य पं. श्री बदरीप्रसादजी साकरिया.

भक्ति और कवित्व, विलक्षणता और कर्मठता तथा ऋजुता और धर्मभीरुता जैसे गुणोंसे संपन्न, परंतु वित्तीय दॄष्टिसे सामान्य परिवार में आचार्यजी का जन्म सन १८९५ में बालोतरा में अषाढ वदी एकम को हुआ था ।

इनके प्रपितामह भक्त कवि प. मगनीरामजी डींगल और ब्रज भाषा के उच्च कोटी के कवि थे । पितामह पं. रामसुखजी विचक्षण बुद्धिके धनी, भगतीरामजी की बगीची में कथावाचक भी थे और साथ ही साथ आउआ ठिकाने के मुकीम थे । पिता फौजराजजी सरल व्यक्ति थे । आचार्यजी में प्रपितामह का वैदुष्य व भक्ति, पितामह की मेघा और पिता की सरलता के दर्शन एक साथ होते है । इन्ही सदगुणों के कारण अनेक विकटत्तम अवरोधों [ऍसे कि आदमी तुटकर बिख्रर जाय ] के बाद भी साहित्य जगतमें उनकी कीर्ति-पताका लहराई ।

मारवाड राज्यमें जब राजधानी जोधपुर को छोडकर कहीं भी कन्याशाला पुस्तकालय नही था तब इनकी मित्रमंडलीने बालोतरामें यह सद्कार्य कर दिखाया । इसके शाथ बालोतरा से छः मील दूर खेड के विशाल मंदिर का कार्यारंभ किया गया । ये कार्य आचार्यजी की सुधारवादी दॄष्टि पुरातत्त्व में रस के प्रतिक है ।

भक्त कवि ईसरदास बारहठ रचित ‘हरिरस’ का वैज्ञानिक ढंग से सुसंपादन उनकी कीर्ति का प्रथम कलश था । चार भागों में संपादित ‘मुहता नैणसी री ख्यात’ आपकी संपादन कला का अन्यतम उदाहरण है । ‘राजस्थानी- हिन्दी शब्द कोश’ [तीन भागों में ] ने उनकी कीर्तिपताका को साहित्य-जगतमें फहाराया । त्रैमासिक शोध पत्रिका ‘राजस्थान भारती’ के तीन विशेषांको ने उनकी यशगाथा को देश विदेश में बढाया । जिस समय फणीश्वरनाथ रेणु बिहार में हिन्दी का प्रथम आंचलिक उपन्यास लिख रहे थे, पंडितजी बीकानेरमें ‘अनोखी आन’ नामक आंचलिक उपन्यास की रचना कर रहे थे ।

हिंदी साहित्य संमेलन, प्रयागने आपको अपनी सर्वोच्च उपाधि ” भारत भारती रत्न ” से विभुषित किया तो समाजने ‘समाजरत्न से । गुजरात राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी ने आपकी साहित्यिक सेवांओ से लक्षमें रखकर, उन्हे ताम्रपत्र, शाल, और सह्स्त्र रुपये भेंट कर सम्मानित किया । गुजरात चारण समाजने भी विद्यानगर में आपका सम्मान किया । मात्र पांचवी कक्षा पास आचार्यजी को सौराष्ट्र युनिवर्सिटी, राजकोटने दो बार पी.एच.डी के शोधप्रबंध जांचने व मौखिकी लेने के लिये परीक्षक नियुक्त किया ।

“राजस्थानी-हिन्दी शब्द कोश” पर उन्हें स्वर्ण पदक अर्पित किया गया एवं राजस्थानी भाषा साहित्य व संस्कॄत अकादमी से पुरस्कॄत हुए ।

समाजने ‘न भुतो न भविष्यति’ वाले एक विरल व्यक्तित्व को ३१ मई सन १९९५ को खो दिया ।

Details from :  “तपोनिष्ठ ब्राह्मणोंका ईतिहास” page no.५४ /५५

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