ब्राह्मण स्वर्णकार कुलभूषण प. पू. श्री धर्मसीजी बाड़मेरा

ब्राह्मण स्वर्णकार कुलभूषण

प. पू.  श्री धर्मसीजी बाड़मेरा

हर जाति के जीवन में ऐसे युग निर्माता अवतरित होते हैं जो उसके हर क्षेत्र की कायापलट कर, अक्षय कीर्ति के भागी बनते हैं। वर्तमान में बाडमेर से 30 कि.मी. दूर जूना केराडू में गौतम गोत्रीय तपोनिष्ठ देवराजजी के कुल में उत्पन्न श्री धर्मसीजी यथा नाम तथा गुण वाले ऐसे धर्मनिष्ठ तथा प्रतिभाशाली कुल-दीपक हुये, जिन्होंने अपने नाम के साथ-साथ समाज को भी समुज्जवल किया। पिताश्री देवराजजी धर्मसीजी के विवाह के पश्चात देवलोक हो गये, पर धर्मसीजी ने अपने पिताजी की दीन दुःखियों की सेवा और साधु संतों की आवभगत की परंपरा को एक व्रत की भाँति निबाहा। एक दिन एक तपस्वी महात्मा उनकी पेढ़ी के सामने रूके। उनको देखते ही धर्मसीजी हाथ पर के सारे कार्य छोड़ कर महात्मा के स्वागतार्थ उठे। उनकी सेवा से साधु बड़े सन्तुष्ट हुये और सदकार्यों के निर्वाह हेतु एक दिव्यमणि प्रदान कर वहाँ से चल गये।

धर्मसीजी इस मणि से अपार वैभवशाली बने। सामान्यतः धन मनुष्यों को घमण्ड़ी बना देता है, पर इससे ठीक विपरीत यह वैभव धर्मसीजी को अपने रास्ते से च्युत न कर सका। वे और अधिक विनम्र भाव से सबकी सेवा करते रहे, उस वृक्ष के समान जो फलों से लदने पर और झूक जात है।

जब उन्होंने देखा कि समाज कुरीतियों से ग्रसित हो गया है और विशेषकर कन्या विक्रय के दूषण से तो वे अत्यन्त क्षुब्ध हुए। उन्होंने संकल्प किया की इस और इस जैसी अनेक कुरीतियों को दूर कर समाज को उन्नत बनाना ही होगा। इस कुप्रथा के कारण अनेक कन्याएँ अविवाहित रह गईं। उन्होंने इन सारी कन्याओं के विवाह बड़ी धामधूम से कर समाज के असंपन्न लोगों की सहायता की, परन्तु इससे भी उन्हें शांति नहीं हुई।

धर्मसीजी के काल के पूर्व तक तो समाज की गोत्र व्यवस्था व्यवस्थित रुप से चल रही थीं, पर समाज में अशिक्षा के कारण अनेक कुरीतियाँ प्रवेश कर गई। धर्मसीजी ने स्व खर्च से समाज का एक सम्मेलन बुलाकर उन कुप्रथाओं को दूर करने का प्रयत्न किया। साथ ही उन्होंने अनुभव किया कि मात्र 9 गौत्रों के कारण वैवाहिक कार्यों में कठिनाइयाँ आ रही हैं। अतएव इसी सम्मेलन में सबकी सम्मति तथा सुगमता की दृष्टि से 9 गोत्रों को 84 खाँपों (अल्ल या अवटंक) में विभाजित कर दिया। वह शुभ दिन अक्षय तृतीया संवत 759 बुधवार था।

उन्होंने समग्र नगर के हितार्थ “जूना केराडू” (वर्तमान में बाड़मेरा से 30 की.मी. दूर) के बाहर चौरंग नाम की बावली तथा देवी का एक मंदिर बनवाया।

ये दोनों आज भी (खण्ड़हर रुप में) उनकी कीर्तिगाथा की ध्वजा फहराती हुई विद्यमान हैं। समाज को चाहिये कि वे इन दोनों स्थलों की देखभाल करे।

(सौजन्यः डॉ. भूपतिरामजी साकरिया – लिखित पुस्तक “तपोनिष्ठ ब्राह्मणों का इतिहास” से उर्द्युत)

श्री धर्मसीजी द्वारा स्थापित गोत्रों का विवरण

क्रम   – गोत्र –    अल्लखाँप अथवा प्रचलित गोत्र

1     अत्रि –        साकरिया, मण्डोरा, मथरिया, मोदेसरा, भोजाल, भीनमाला, कोटडिया, नथमल, कथीरिया, भाटी

2     कश्यप –   काला, भजूड, बूचा, कठडिया, सोलंकी, कुंभलमेरा, पालडीवाल, लखपाल, पालीवाल

3     कौशिक–   छापरवाल, बेडचा, चौहाण, पवार, गहलोत, सिंघल, नाथडा, हथेलिया, कटारिया, आमलिया

4     गौतम –    बाडमेरा, लाडनवाल, धांधल, झोडोलिया, हाडा, लोलग, आसोपा, खेजडिया, पणधारी

5    पाराशर – महेचा, चित्रोडा, श्रीश्रीमाल, भोगल, मणिहार, चोवटिया, छ्तराला,

तांबेडा, पोमल

6     भारद्वाज –  कट्टा, जालोरा, जोजावरा, परमार, देवल, मंडलीवाल, गोयल, रायपाल, मंडलिक, मूथा

7     वत्सस –    हेडाउ, राठोड, वीसा, रुपसी, रुहाडा, बडगाँवा, दिया, बीजाणी, रतनपुरा, रमीणा

8     वशिष्ठ –      जसमतिया, डुंगरवाल, लायचा, गढेचा, ईडरिया, भूपाल, भागीजा, बरतडा, लोरका

9     हरितस –    खटोर, राडा, मेवाडा, ईया, सरवाडिया, नूनेचा, बुधमाटी, आमथलिया

रेफ. ( श्री ब्राह्मण स्वर्णकार समाज ( द.म.क्षेत्र), द्वितीय जनगणना, सन् 2005, प्रकाशक – सामूहिक विवाह समिति, से साभार)

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