श्री छगनीरामजी (छिनजी) कट्टा – जोधपुर

श्री छगनीरामजी कट्टा, जिन्हें प्रेम से सभी छिनजी  कहा करते थे , तत्कालीन जोधपुर समाज के अति उत्साही कार्यकर्ता थे. हाथरस महासभा को मूर्त रूप देने में जो सज्जन लगे हुए थे, उनके आप उत्साही समर्थक व सहायक थे.

एक निर्भीक कार्यकर्ता के रूप में भी आपकी अच्छी छाप थी. आप ब्यावर में नियत कार्यकारिणी के एक सदस्य तथा जोधपुर महासभा को सफल बनाने में आप काफी सक्रिय रहे थे. आपके पुत्र का नाम श्री दौलतरामजी था.

ज्योतिर्धर श्री बंशीधरजी जडिया…..

आपका जन्म २९ नवंबर १९०६ को रतलाम में ननिहाल में हुआ था. दादा श्री रामबख्शजी रामभक्त व कथाकार थे तो पिता श्री नंदरामजी स्वाश्रयी, कठोर परिश्रमी व विविध व्यवसायों को जानने वाले गुणी व्यक्ति थे.उन्होंने स्कूल के कभी दर्शन तक नहीं किये, किन्तु आपने बच्चों को उच्चतम शिक्षा दिलाई. श्री बंशीधरजी ने अपने पिता के इस आदर्श वाक्य को हृदयंगम कर लिया था कि ऋण लेकर कभी कोई कार्य्‌ नहीं करना, सदैव सत्य बोलना व आध्यात्मिक चिंतन करना! यह मूलमंत्र असफलता के दिनों में उन्हें ढाढस देता और अवरोधों को दूर करने की प्रेरणा देता.

बचपन में जडाई का कार्य करना पडा. डॉ. जयदेव प्रसादजी शर्मा की प्रेरणा से १९ वर्ष की बडी उम्र में फिर से स्कूल जाना शुरु किया. आगे चलकर इन्हीं डॉ. साहब के चाचा श्री दौलतरामजी की पुत्री से सन्‌ १९२८ में विवाह हुआ. पर पढना न छोडा. अनेक शारीरिक, आर्थिक व मानसिक कठिनाइयों के बावजूद आपने बनारस विद्यवविध्यालय से एल.एल.बी.(१९३३) तथा सन १९३४ में एम.ए.(अंग्रेजी) में द्वितीय श्रेणी में पास किया. आपने वकालत शुरु की पर असत्य का रास्ता होने के कारण उसे शीघ्र ही तिलांजलि दे दी. जडत व वकालत के कार्यों को उन्होंने खड्‌डे से निकल कर कुंए में गिरने के समान बतलाया है. अंततः आपने स्थानीय मिल में सुपरवाईजर की नौकरी कर ली. सन १९५६ से १९५९ के चार वर्षो की अवधि में इन्हें कई छोटी मोटी नौक्ररियाँ करनी पडीं और अंत में १९६० से १९८५ तक घर पर ही अध्यापन का कार्यखूब  परिश्रम पूर्वक कर जीवन निर्वाह किया.  परिणामस्वरुप घुटने बेकार हो गये.

अंग्रेजी में एम.ए. और एल.एल.बी. होते हुए भी हिन्दी साहित्य के प्रति आपकी रुचि प्रारंभ से थी. किशोरावस्था में ब्यावर हिन्दी समिति की स्थापना की और आपको उसका मंन्त्री निर्वाचित किया गया. अपने मन्त्रित्वकाल में आपने हिन्दी के अनेक विद्वानों को आमन्त्रित कर हिन्दी के प्रचार प्रसार में बडा योगदान दिया. यही अभिरुचि आगे जाकर पल्लवित व पुष्पित हुई और एक काव्य संग्रह ”ज्योति किरण” तथा एक निबन्ध संग्रह ”गहरे पानी पैठ” से आपने हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि की. आधुनिक हिन्दी के निबन्ध संग्रहों में यह उनकी गणना पात्र कृति है.

अध्यवसाय की प्रतिमूर्ति, कवि व लेखक निष्ठावान व ईमानदार तथा स्वाश्रयी जीवन के उद्‌घोषक श्री बंशीधरजी हमारे समाज के एक ज्योतिर्धर थे. ८ जनवरी, १९८७ को उनके निधन से समाज को ऐसी भारी हानि हुई है, जिसकी पूर्ति असंभव है.

आपके बडेपुत्र श्री सत्यप्रकाश कस्यप ‘लार्सन एन्ड टुर्बो’ जैसी बडी कम्पनी के बोर्ड ओफ डिरेक्टर्स के वाइस चेरमेन है.

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Details from : “तपोनिष्ठ ब्राह्मणों का ईतिहास” page no.69 /70

Photograph from : स्वर्णप्रभा

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Soni Sunderlal Prahladji

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जौहरी श्री हरिरामजी बाडमेरा……..

जोधपुर में ब्राह्मण स्वर्णकारों की घाटी पर निवास करने वाले श्री हरिरामजी हमारे समाज में अपने समय के धनिकों में जैसे अग्रणी थे, वैसे ही समाज सेवा और दानदाताओं में भी अग्रणी थे़. रत्न-परीक्षा व मानव-परीक्षा के आप विशेषझ थे.

आपके और कुछ सदस्यों के विचार विमर्श और निरंतर बैठकों के पस्चात्‌ हाथरस की महासभा बुलाई गई थी. आपकी अमूल्य सेवाओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए ब्यावर में सन्‌ १९२४ मे आयोजित महासभा के आप अध्यक्ष बनाये गये.

जोधपुर में आयोजित तृतीय महासभा के आप स्वागताध्यक्ष थे और सच तो यह है कि जोधपुर सम्मेलन की सफलता का सारा श्रेय आपको व आचार्यं बदरीप्रसादजी साकरिया को है.

आचार्यजी ने चौधरियों और पंचों के झगडे को अत्यन्त युक्तिपूर्वक समाप्त कर दोनों से सहयोग प्राप्त किया. अपनी मातृभाषा को प्यार करने के कारण आपने स्वागत भाषण मारवडी में दिया. यह भी एक अद्‌भुत घटना ही मानी जायेगी. जब जोधपुर में समाज की स्कूल धन का प्रश्न आया तो आपने अपनी ओर से पचास रुपये तक की मासिक रकम खर्च करने की सत्ता डॉ. गोविन्दरामजीआचार्यजी को सौंपी थी.
आपके पिता श्री कालूरामजी भी नेक व जवाहरात का धन्धा करने वाले धनाढ्‌य व्यापारी थे.

Details from : “तपोनिष्ठ ब्राह्मणों का ईतिहास” page no. 44_____

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Notes from : अखिल भारतीय श्री ब्राह्मण स्वर्णकार महासभा-स्थापना काल से अब तक…….

द्वितीय सम्मेलन ब्यावर – ब्यावर में जोधपुर निवासी श्रीमान जौहरी हरिरामजी बाड़मेरा के सभापतित्व में 3 नवंबर सन् 1924 को अभूतपूर्व ढंग से संपन्न हुआ। बीकानेर व ब्यावर के नवयुवक मण्डल के कार्यकर्ताओंने अधिक मेहनत की थी। श्री नन्दलालजी स्वागताध्यक्ष थे। श्री नारायणदासजी बैरिस्टर व श्री रामनाथजी जसमतिया ने सम्मेलन अध्यक्ष श्री जौहरी हरिरामजी का माल्यापर्ण कर स्वागत किया। फूलों से सजी जीप में उनका शानदार जुलूस निकाला गया व बन्दूक फोडकर सलामी भी दी गई।

चार दिनों तक चले सम्मेलन में महासभा के अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया संपन्न की गई। स्वागताध्यक्ष श्री नन्दलालजी ने अध्यक्ष पद हेतु जौहरी श्री हरिरामजी का प्रस्ताव रखा, जिसे श्री बद्रीप्रसादजी साकरिया ने समर्थन दिया। सर्व सम्मति से श्री जौहरी अध्यक्ष चूने गये। कार्यकारीणी में कुल 67 सभासदों का समावेश किया गया। पूरे देश से कुल 204 प्रतिनिधियों ने अपनी उपस्थिति दी थी। इसी समेलन में श्री बदरीप्रसादजी साकरिया को उनकी विद्वता को देखकर पंडित की उपाधी से विभूषित किया गया।

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First Dr. Of Our society… डो. गोविंदरामजी हेडाऊ..

Dr. Shri. Govindramji Herau, समाज के प्रथम डो. श्री गोविंदरामजी का जन्म सादडी में श्री अनोपचंदजी के यहां 28 अक्टूबर, 1894, को माता श्रीमती मणिबाई की कोख से हुआ था । श्री अनोपचंदजी की आठ संतानो में गोविंदरामजी सबसे बडे थे । वे मितभाषी व मिष्टभाषी दोनों थे । पिता ने पुत्र की योग्यता को भांप कर उन्हे शिक्षा के लिये जोधपुर भेजा, उसके बाद अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुये भी आपने इंदोर से एल. एम. पी. की उपाधि प्राप्त की ।

वहां से लौटने पर आपकी नियुक्ति राजकिय चिकित्सा विभाग के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्रों के लिये हुई । इसमें प्रति मास एक निश्व्चित कार्यक्रम होता था, और जो मिले, उसी वाहन पर गांव मे जाना पडता था । दस वर्षों की ऍसी कष्टमयी सेवा के उपरान्त आपकी नियुक्ति जोधपुर के महिलाबाग चिकित्सालय में हुई। यहीं से “जिवाणु विज्ञान” में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये आप कलकत्ता भेजे गये और वहां से लौटने पर चिकित्सकीय अनुसंधान व प्रयोगशाला को सुव्यवस्थित कर अपनी कुशलता व विश्वसनीयता का परिचय दिया ।

इसके बाद आपकी नियुक्ति वर्तमान महात्मागांधी अस्पताल में हुई । वहां आपके सदव्यवहार, सेवा व लगन की सुवास सर्वत्र फैली । यही कारण था कि मारवाड राज्य के चुनंदे जागीरदार, राज परिवार के सदस्य. व्यापारीगण तथा साधारण जन बडी मात्रा में इनके यहां चिकित्सार्थ आने लगे । चौंतीस वर्षो की सुदीर्ध सरकारी सेवा के पश्व्चात आप निवृत हो कर अपने निवास स्थान पर ही दीन दुखियों की अति कम फीस पर सेवा करने लगे । तत्कालीन महाराजा हनुवंतसिंहजी जब सरदारसमंद में बीमार थे तो डो. गोविंदरामजी नित्य शाम वहां जाया करते थे । उनके लिये विशेष मोटर तैनात थी ।

समाज की पिछडी दशा से आप पुर्ण परिचित थे और मानते थे कि विना शिक्षा के उद्धार नहीं हो सकता है । इसी पूत भावना से प्रेरित होकर आपने सन 1928-29 में ब्राह्मण स्वर्णकारों के महोल्ले में शिक्षा प्रसार हेतु रात्रि पाठशाला प्रारम्भ की । अपने अनुज श्री अमृतलालजी को वहां पढाने का कार्य सोंपा गया और घाटी पर एक नई पाठशाला खोलकर स्वयं पढाने लगे ।

ब्राह्मण स्वर्णकार महासभा के जोधपुर अधिवेशन के स्वागत समिति के आप कोषाध्यक्ष चयनित हुए थे तथा महासभा द्वारा उदघाटित प्राईमरी स्कुल के संचालन के लिये जिन दो व्यक्तियों को नियुक्त किया गया था, उनमे एक तो डॉ. साहब स्वयं थे और दुसरे थे पं. बदरीप्रसादजी साकरिया । जौहरी हरिरामजी बाडमेरा (घाटोपर) द्वारा पचास रुपये मासिक तक की आर्थिक सहायता से डो. साहब स्कुल का संचालन व निरिक्षण करते थे ।

आप ही ने सर्वप्रथम यह सूचना दी थी कि सादडी मे एक शिलालेख है, जिसमें हाथी पर सवार होकर तोरण बांधने आये दुल्हे की हत्या की गई थी । इसकी तलाश करने के लिए आचार्यजी ने बीसों प्रयत्न किये, पर समाज की गफलत से उसका पता अब तक नही चल रहा है । स्वर्णप्रभा के एक लेख में श्री चतुर्भजजी जिज्ञासु ने इसके होने का समर्थन किया था ।

इकहत्तर वर्ष की अवस्था में मस्तिष्क में रक्त-स्त्राव के कारण दिनांक 18 दिसम्बर 1966 को आपका देहावसान हो गया ।

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Details from : “तपोनिष्ठ ब्राह्मणों का ईतिहास” page no.43 /44

Photograph : From Rare Collection of Shri Bhupatiramji Sakariya – Vidhyanagar [Guj.]

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110 years ago………… A great man ……………….. श्री नारायणदासजी बैरिस्टर

110 years ago……….. A great man… Barrister Shree Narayandasji..

आज से ११० वर्ष पूर्व जब सारा देश शिक्षा में पिछडा हुआ था तो मारवाड राज्य का तो कहना ही क्या ?

और उसमे भी हमारे समाज की अवदशा का वर्णन भी नहीं हो सकता । ऍसी विपरीत परिस्थितियों में समाजके एक नव युवक का विलायत से बेरिस्टरी पास करके लौटना हैरत अंगेज ही माना जायेगा !

आपके पिताजी का नाम श्री चौथमलजी था ।  तीन भाइयों में [श्री जगन्नाथजी और बदरीदासजी दोनो बडे] सबसे छोटे श्री नारायणदासजी अपनी प्रतिभा के बल पर तथा अग्रज बदरीदासजी व जोधपुर के रिजेण्ट सर प्रताप के घनिष्ठ सबंधो के कारण बेरिस्टर बन सके । विलायत से लौटते समय वे युरोप के अनेक देशो और अमेरिका, कनाडा, जापान आदि प्रगतिशील मुल्कों की यात्रा कर आयें ।

जोधपुर लौटने पर उनकी इच्छानुसार सर प्रतापने उनको पाली का हकिम बनाया [Sir Pratap Singh (1845-1922) was the Maharaja of Idar between 1902 and 1911. He also served at various times as regent and chief Minister of the princely state of Jodhpur. He was  also an accomplished soldier and sportsman.]।

नारायणदासजी समाज के पहेले हाकिम थे । हाकिमी करते समय प्रशासकीय कार्य तो आपने अति कुशलता से किये, जिससे उनकी सर्वत्र प्रशंसा हुई । परन्तु इसके साथ साथ समाज हित आपने कभी ओझल नही होने दिया । परिणामस्वरुप वर्चस्व वाले धनाढ्य वर्ग से उनकी न बनी और उन्हे हाकिमी छोडनी पडी ।

Sir Pratap -Idar

Sir Pratap King of Idar

सर प्रताप  उनकी कार्य कुशलता के कायल थे । अतएव उनको अपने राज्य ईडर ले गये, जहॉ सात वर्ष तक वे सेशन व डिस्ट्रिक्ट जज रहे । गौर वर्ण तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी बैरिस्टर साहब बहुत ईमानदार, निर्भिक व स्पष्टवक्ता थे । जीवन में भाग्य जैसी भी कोई वस्तु होगी,  नहीं तो इन गुणोंसे युक्त पुरुष किसी हाईकोर्ट के चीफ जज बनते ।

वे अपने वचन के पक्के व मातृभक्त थे । किसी से यह बात सुनकर कि लंदन में मांसादि खाना पडता है, उनकी माताने मना कर दिया। श्री नारायणदासजीने तब प्रतिज्ञा की कि वे इनका स्पर्श तक न करेंगे, तब कहीं मातासे आज्ञा मिली । जब यह समाचार सर प्रताप को मिले तो वे प्रसन्न हुये पर लंदन में शरीर गरम रखने की आवश्यकता को समझ उन्हें खानेके लिये कस्तुरी की गोलियां साथ में दीं ।

श्री नारयणदासजी और उनके सहयोगी पं. बदरीप्रसादजी साकरिया में प्रगाढ मित्रता थी और इन दोनों के अथक प्रयत्नो के फल स्वरुप महासभा की नींव रखी गई । ब्यावर महासभा में आपने चार व्याख्यान दिये तथा उनकी सभा संचालन की पटुता ने उपस्थित समुदाय पर भारी प्रभाव छोडा । बीकानेर के चौथी महासभा के आप अध्यक्ष बनाये गये थे।

आप ही के प्रयत्नों के फल स्वरुप स्वर्णकारों पर जो “ख्ररडा” टेक्स लगाया जाता था, वह बन्द करवाया गया । दो तीन सदियों से चले आ रहे घोडे के झगडे से उत्पन्न विकट परिस्थितियों को दुर करने का आपने जोरदार प्रयत्न किया । तत्सम्बन्धी केसों की कोर्ट में पैरवी की । समाज सुधार व संगठन के लिये आपने श्री प्रतापचंदजी वकील [जेसोल] के साथ एक अपील सन १९०८ में प्रसारित की थी । आपकी समाज के प्रति अनन्य निष्ठा थी ।

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Details from  :  “तपोनिष्ठ ब्राह्मणों का ईतिहास” page no.४२ /४३

Photograph : From “Swarn-Prabha” -Jun/July -year 1971

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Soni Sunderlal Prahladji

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